"Thou wast not born for death, immortal Bird!

I have been trying to escape. The nightmare that we are living in is putting a burden on our generation in a way that is going to shape our lives from now on. When I sit to write this, I myself am coughing and been taking antibiotics for the last two days. The body aches and doesn't respond well to whatever news comes my way. And, in the bouts of high fever, I close my eyes and try to go back to my BA days- Department of English, Patna College, 2012 - the world of bliss. And She is there. 

                  The news comes. MSG is no more! It takes a while to process this. It takes a while to realize what would that mean. The news is not sudden. There has been a fear that has crept up in the past few days and even then it hits you in a way that a part of you dies. So many memories get hold of you. The first memories are of her late-afternoon classes on Lawrence and Hardy. I used to hang around Bhasha Bhavan, waiting for her to arrive. I would play some cricket, chitchat with hostelers and would sheepishly look at my crushes. Also, sometimes I would sit in the shade of a tree, read some poetry from here and there and would scribble in my notebook. And from there I would wait for a glimpse of her car. Often, she would drive herself. Bholi Bhaiya would be waiting. By the time she would climb up the stairs with his support, we would be lined up waiting to wish her. She would smile at us and her eyes would twinkle. She smiled with her eyes!

                                        I remember being mesmerized by the charm, that old-world charm which I am going to associate with every memory of my college life. In a way, time stopped in Patna College and at the same time, it ran very fast. Now that I look back, I feel that there was so much that could have been learned from her. She was cheeky. Her humour, her jokes, I borrowed. This one particular memory is etched in my mind. I was madly in love with this "very-very" senior girl I was seeing at the time. The world was new and full of promises. So, I had visited the book fair and somehow, someone clicked a picture of us in front of an ice-cream stall. On the next day, This picture was printed in The Hindustan Times on the second page. She walks into the class and as soon as she enters, she makes me stand up and then, this is how the conversation goes : 

 "Boy, are you in today's newspaper?" 

"Yes, Ma'm." 

"Is that your girlfriend?" 

"Yes, Ma'm."

"Do your other girlfriends know?"


                             And the classroom fills with laughter. This was her - full of humour, full of life and full of fearlessness, never imposing and easy going. Her classes were fun because she would never let them become hectic. Another trait that I adopted when I started teaching! At the time, the writers she taught were my favourite writers, Lawrence still remains close and would remain close for life. She was like the river which flows nearby, She was like the trees on the campus, She was like the birds that chirp in the campus and She was, for people like me who had been lonely, a guardian to whom one could talk about anything. 

                                        When I met her last, a few years ago, She had not been keeping well. Her physical health had troubled her for a long part of her life. Her mind however was younger than my own. She was full of enthusiasm. She was sitting inside her car as she could not walk up to the store her daughter was shopping from. I asked her what she was doing after retirement and she said she was writing a novel, something that related to A Passage to India. She had done Howard's End with us at one point in time and Forster might have been a favourite. To me, She was Keat's Nightingale. It is impossible to imagine my ideal escape without placing her there in the Department. The Kindness and Warmth you showered upon us will remain with us for our entire lives - 

                                 "Thou wast not born for death, immortal Bird!
                                  No hungry generations tread thee down..."

Adieu, Ma'm. Look upon your children. 

मैं वहाँ का हूँ

मैं वहां का हूँ. 
मेरे पास कई यादें हैं. 
मैं भी ऐसे ही पैदा हुआ जैसे सब होते हैं.
मेरे पास एक माँ है,
कई खिडकियों वाला एक घर है, 
भाई हैं, दोस्त हैं, और 
सर्द खिड़की वाली एक जेल की कोठरी. 
समुद्री बगुलों से चुराई हुई एक लहर, 
मेरा अपना पैनोरमा, 

मेरे पास एक संतुष्ट टापू है. 
मेरे शब्दों के गहन फलक पर छुपा हुआ, मेरे पास एक चाँद है,
एक चिड़िया भर खाना है और एक अमर जैतून का पेड़.
मैं तब से ज़मीन पर रहा हूँ जब तलवारों ने आदमी को शिकार में नहीं बदला था. 

मैं वहां का हूँ, 
जहाँ जन्नत अपनी माँ के लिए रोती है,मैं जन्नत को उसकी माँ लौटा देता हूँ.
और मैं रोता हूँ ताकि लौटता हुआ एक बादल मेरे आंसू शायद ले जाए.

नियम तोड़ने के लिए, 
मैंने वो सब शब्द सीखे हैं 
जो खून के मुक़दमे के लिए ज़रूरी हैं.

मैंने तमाम शब्दों को सीखा 
और तोड़ मरोड़ कर फेंक दिया 
ताकि उनसे बस एक शब्द बना सकूँ:

महमूद दरवेश 

रफ़ नोट्स , संदर्भ : कविता

  • कवि कहाना दरअसल 16 की उम्र में प्रेमी कहाने जैसा है.  दोस्तों में भाव मिला सो अलग, कवि होने का आकर्षण अलग. निमित्त और नीयत पर आदमी क्या सोचे. बहरहाल, बात ओपन माइकियों की. वायरल होना नया नशा है. इसके लिए कुछ भी किया जा सकता है. लाईकों के ज़ोर पर जब कैन्सर के मरीज़ों की जान बचाई जा सकती हो और पूरे अफ़्रीका को खाना खिलाया जा सकता हो तो इतनेसेल्फ़-पब्लिशिंगपोर्टल और अपनी प्रोफ़ाइल पर कुछ भी लिख कर उसको कविता तो मनवाया ही जा सकता है. 
  • ओपन माइक को हाइप बहुत मिलता है. संस्थाएँ भी बहुत हाइप खींच लेती हैं. उनकी मार्केटिंग भी हो जाती है और नया लड़का, जिसने टेढ़े बाल कटाए हैं, जिसने सोचा है कि एक दिन वह दुनिया भर में फ़ेमस होगा, जिसने सोचा है कि उसकी प्रोफ़ायल पर सुंदर लड़कियाँ दिल बनाएँगी - उसको ही तो उत्तर-आधुनिक काल में कवि कहाना है.  हीरो हुआ जा सकता था-गिटार बजाया जा सकता था- कविता ही क्यों, जब सब परिश्रम फ़ेमस होने के लिए. या वायरल होने के लिए. और लिखे हुए को कविता ही क्यों मनवाना.  वैसे टी.एस. एलीयट एक जगह, मेहनत करने वाले लोगों से भी कहता है, जब तक पच्चीस साल के बाद भी कविता ना लिखते रहो और जीवित रहो, ख़ुद को कवि मत कहो
  • यह एक बड़ा बेसिक सवाल है कि कविता किसको कहा जाए और कवि किसको कहा जाए. चूँकि आर्ट्स सबजेक्टिव है, इसीलिए मामला उलझता है. मामला और उलझता है क्योंकि हमारी सोच उत्तर -आधुनिकता में रची बसी है इसीलिए मामला और गड़बड़ा जाता है.  संजय कुंदन ने पुस्तक मेले में कहा कि शौक़िया भी बहुत लोग कविता लिखते हैं. मेरा मानना है कि दरअसल ऐसे लोग प्रैक्टिसिंग पोयट्स नहीं होते . संजय कुंदन इसी बातचीत में आगे यह भी कहते हैं कि हो सकता है ज़िंदगी में किसी ने पाँच सौ कविताएँ भी लिखी हों और वह कवि ना हो. ज़ाहिर है जो पाँच सौ कविताएँ लिखेगा उसको कुछ ना कुछ तो अच्छा लिखते ही हैं लेकिन वे कवि नहीं होते. बॉब डिलन एक जगह कहता है कि वह बहुत सारे ऐसे अच्छे कवियों को जानता है जिन्होंने अपने जीवन में एक भी कविता नहीं लिखी.  कहा जाता है कि जिस चीज़ के बारे में आप सीधा बता पाएँ वह कविता नहीं है. सो मैं भीसजेस्टभर कर सकता हूँ. जैसे मृत्युंजय कहते हैं कि गद्य में जो ना कहा जा सके बस वही कविता है. ज़ाहिर है, कई जगह बहुत पारिभाषिक होना होगा और तुकबंदी भर कर के कविता नहीं हो सकती ना आप कवि हो सकते हैं. 
  • सत्ता के केंद्र के ख़िलाफ़ विरोध की एक मुख्यधारा होती है. उसी पंक्ति में चलते हुए विरोध की एक अंतर्धारा भी होगी. लेकिन उधर नहीं जाना. सत्ता और विरोध की मुख्यधारा के बीच जो जगह है- वह जगह पॉप्युलर कल्चर भरता है - जिसकी फ़ेस वैल्यू विरोध की मुख्य धारा को इमिटेट करती हुई सी होती है. पर वह उस मुख्य धारा का मिमिक भर होता है जिसका उद्भव रीबेल करने के कारणों में ढूँढा जा सकता है. कारणों में फ़्रॉडीयन कॉम्प्लेक्सेज़ से लेकर सामाजिक हीनभावना तक हो सकते हैं. मुझको लगता है कि असल में यह वर्ग अभिजात्य होता है पर इसका चेहरा सूडो-सर्वहारा होता है. उत्तरआधुनिकता इनको यह सुविधा प्रदान करती है कि यह अपनी मान्यताओं के नाम पर हो-हल्ला कर सकें और परिश्रम से बचते हुए अपने कोसहीघोषित कर सकें. यह सीमा साहित्य, संगीत और कला या इनके छद्म रूपों से आगे जाती है. यह उसी आशय का चुनाव है जैसे- ग़लत ट्रम्प की जगहसहीहिलेरी को चुनना. स्टेटस क्वो का एक और खेला. पूँजीवाद यह जगह भी छीन लेना चाहता है, यह कोई बहुत अद्भुत ऑब्ज़र्वेशन नहीं है. घुसपैठ हर जगह शामिल है. 
  • कविता लिखने का नया फ़ॉर्म्युला है, ताकि कुछ को भी कविता कहा जा सके. बड़ी साहित्यिक गोष्ठियाँ करने वाले भी यह काम अपने अधिकारों को आवाज़ देने के नाम पर करते हैं. लेख लिखने वाले को आवाज़ों को जगह देने से दिक्कत नहीं है. लिखे हुए को कविता कह दिए जाने से है, और लिखे हुए को कवि कहे जाने से. 

  • एक आम आदमी किसी के कैन्सर का इलाज नहीं बताता ना किसी इंजीनियर से मकान बनाने का नक्शा बनाने पर बहस करता है.  लेकिन कविता में चूँकि गणित नहीं दिखता/होता  इसीलिए हर आदमी कविता पर मत दे सकता है और मज़े में बता सकता है कि क्या कविता है या क्या नहीं है. तर्क नहीं चाहिए. कविता सबजेक्टिव चीज़ है. क्या हुआ जो भाषा परम्परा, काव्य परंपरा और नया लिखा पुराने पर और पुराना लिखा नए पर किस तरह का असर डालता है, इसकी समझ हो कि नहीं
  • नया कवि (अगर वह गम्भीर है और कविता के लिए या किसी साहित्यिक प्रयोजन के लिए कविता करता है) अमूमन मंच खोजता है. लेकिन उसको इस लोभ से बचना चाहिए और कहीं भी कविता नहीं  पढ़नी चाहिए. उसको इस बारे में बहुत सोचना चाहिए. अपने प्रयोजनों के लिए उसका इस्तेमाल हो सकता है - पूँजीवाद का टूल भर पटना क्या ज़रूरी है. अगर कवि इस्तेमाल नहीं होंगे तो सम्भव है उनकी प्रशंसा हो जाए. मेरी समझ से इससे भी डरना चाहिए. यह ग़लत चाह जगाती है  और इसका बुरा असर कविता पर पड़ता है. 
  • कवि के काम क्या क्या हैं? इसपर मैं बहुत सोचता हूँ. एक काम तो है कविता करना.लेकिन मुझे लगता है कवि के पास रीढ़ तो होनी ही चाहिए. उसके पास एक मत भी होना चाहिए. एक राजनीतिक मत. सबके साथ शुचिता आवश्यक लगती है क्योंकि शुचिता के बिना ईमानदारी सम्भव नहीं है. और ईमानदारी नहीं होगी तो सामने वाला व्यक्ति भले ही बहुत अच्छी कविता लिख ले, वो कवि कैसे होगा? ये सारी चीज़ें सबजेक्टिव हैं. 
  • कवि को सेलिब्रेटी होने से या इसकी चाह से बचना चाहिए!
  • कवि को अपने समय के लिखे हुए और पहले के लिखे हुए को पढ़ना चाहिए- यह भी बहुत पुरानी बात. सिर्फ़ यहाँ जमा कर रहा हूँ.
  • जो सुनने में अच्छा लगता है, वह पढ़ कर भी उतना ही अच्छा लगता है क्या? यह कविता से जुड़े हर आदमी को सोचना चाहिए.
  • अच्छी कविता पढ़ना और कविता को अच्छे से पढ़ना दो बातें हैं.
  • जैसा युवा कवि बालमुकुंद कहता है, “(आम तौर पर) ओपन माइक पोएट्री जैसे आयोजनों में सारी चीज़ें होती हैं सिवाय पोएट्री. वहाँ एक विचित्र तरह का शोर है, कविता पब्लिक करने के नाम पर रैंप शो टाइप ट्रीट करने की निर्लज्ज मानसिकता है, एक खास प्रकार का सलेब्रेटिसम है जो सीधा सीधा कैप्टिलिज्म का सहोदर है और अंतर्मन से उसी पर वृत्त हैं. एक वैचारिक शून्यता है जहां कविता की जगह कविता के नाम पर आदिम अश्लील प्रवृत्तियों का बेवजह पुनर्स्थापन है जिसकी एक एक गतिविधि सिर्फ़ अच्छी और गंभीर कविता के विरोध में खड़ी होती है, बल्कि उसका सुनियोजित तरीके से उपहास करती है.
  • कविता कोपरफ़ॉर्मकरना एक पूँजीवादी विचार लगता है - आदमियत से बहुत दूर. परफ़ॉर्म शब्द के आधुनिक अर्थ में जो दबाव निहित है, साहित्य उन दबावों से मुक्त करने के लिए होता है.
  • शुद्धतावादी होना अपने में बुरी बात नहीं है जैसे कलावादी होना भी कोई बुरी बात नहीं है. कविता में आप इन दोनों के साथ हैं या नहीं, इसका निर्णय कैसे होगा. तब तक तो नहीं ही होगा, जब तक लिखे हुए को कविता ही ना कहा जा सके.  फिर वही प्रश्न है कि लिखा हुआ जो कुछ भी है क्या वह कविता है- अगर है तो अच्छा है या बुरा है- परिमाण तो चाहिए ही.
  • कला में और कविता में अनंत सम्भावना है. यह ग़लत बात है. “अनंतशब्द ख़ुद एक सीमा का बोध कराता है और किसी अन्य दूरी की तुलना में होता है. इसी तरह कला या कविता के विशेषण भी इंडिपेंडेंट नहीं हो सकते.
  • किसी भी राजनीतिक स्टैंड से परहेज़सुविधा है. जो बहुत स्थापित कवि भी कई बार ले लेते हैं.  कई बार यह बहुमत के साथ चलना भी है. मुझे लगता है कि कविता अपने बेसिक नेचर में माईनौरिटी की तरफ़ झुकी होती है. फिर भी यह व्यक्ति-विशेष के मत और उसकी शुचिता का सवाल है. कविता इससे मुक्त होगी.
  • आलोचना हमेशा विज्ञान के ज़्यादा नज़दीक होगी. वहाँ तर्क चाहिए होंगे.
  • कविता के स्तर का निर्धारण समाज से नहीं होता. कीट्स को समीक्षकों तक ने ख़ारिज कर दिया था. डन को चार सौ सालों के लिए भुला दिया गया था. हिंदी के अच्छे से अच्छे कवि को कई बार दो सौ रुपए की रॉयलटी मिलती है. समाज का ख़ारिज करना उनको काव्य परम्परा से विमुख नहीं करता. The present alters the past and the past alters the present. काव्य परम्परा की बात करते हुए एलीयट कुछ इस तरह की बात करता है.
  • अंत में, ओपन माइक जैसे आयोजन (हालाँकि नाम से यह बहुत लोक-तांत्रिक लगते हैं)  साहित्य की उत्सव-धर्मिता को इंगित करता है. साहित्य में उत्सव-धर्मिता है, यही ख़याल मुझे सबसे ज़्यादा डराता है. बाक़ी लोकतंत्र पर सोचते हुए प्लेटो याद आते हैं और मैं ग़ुलामों के बारे में सोचता हूँ. चार पाँच साल में ही स्थिति बदली है और कविता करने के लक्ष्य और कविता से आकांक्षाएँ - दोनों भीषण रूप से बदली हैं.  कवि कहा जाने की यह सनक, कम से कम नए युवाओं को ख़राब करती हुई दिखती है  जो शायद ख़राब होना चाहते हैं.  
  • जो कुछ ओपन माइक के संदर्भ में कह रहा, वह आम सोशल मीडिया पर प्रचलित कविता और कई स्थापित नामों के संदर्भ में भी सच है. ओपन माइक जैसे आयोजनों में चूँकि घुसपैठ सीधी सीधी दिखती है इसीलिए उनका उदाहरण बेहतर समझ आता है . जो छुपे हुए लोग हैं, उनको भी कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए. औसत जो कुछ भी है, या लिजलिजापन लिए हुए, उसके जाल को बेधना होगा. 
  • जो जेनुइन कविता से प्रेम करते हैं वे दुखी हो सकते हैं लेकिन जो डेकडेंस सभ्यता में फैल रहा है कविता उससे कैसे अछूती रहे?