सफ़रगोई : फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया - दिल्ली का एक दिन


दिल्ली
के बारे में यात्रा वृतांत कौन लिखता है
वह भी जाड़े की दिल्ली के बारे में, प्रदूषण से भरी हुई दिल्ली, उसमें क्या सुंदर! लेकिन आप सफ़र पर निकले हों, किसी के पीछे निकले हों और किसी के साथ रहना चाहते हों तो दुनिया सुंदर लगती है। एयरपोर्ट से ही गड़बड़ शुरू होगी।वह लेट आएगी। छोटे दड़बे-नुमा एयरपोर्ट पर भीड़ भी होगी। अलग बोर्डिंग पास बनेगा, सीटें दूर होंगी। काम तो कुछ होता नहीं, दिल्ली के लोग कुछ ख़ास पसंद भी नहीं आते, पर लालसाएँ ही कवियों से सारे ग़लत काम कराती हैं। 

एक ख़्वाब की तरह उस एक दिन को गुज़रना है। इसीलिए सब ठीक हो जाएगा।


वह  एयरहोस्टेस से कहेगी कि हम दोनों भाई बहन हैं और हमें साथ सीटें दे। वही एयरहोस्टेस बाद में आप दोनों को एक दूसरे को चूमते देखेगी। ग़ालिब की हवेली, पुरानी दिल्ली का सबसे बड़ा तीर्थ है। बल्लीमारां की गली क़ासिमजान। वहाँ, रिक्शे से जाइए। रिक्शा जामा मस्जिद के पास से लीजिए। बग़ल में महबूब को बिठाइए। उसको कहिए कि उस दिन काले कपड़े पहने, उसको कहिए कि सर पर दुपट्टा रख ले। रिक्शे वाले से कहिए कि वो हर जाम में देर देर तक फँसे। और आपको बरसों से पता है कि उसको कविताएँ समझ आती हैं। आप बरसों से जानते हैं कि यह सब क्षय के बीच घट रहा है, कि ज़िंदगी के बीच वह आपके लिए ख़्वाब बन के आयी है। आप मत्था टेकने जाएँ, दिल्ली के सबसे बड़े शराबी के घर और महबूब साथ हो, यही एक दुआ तो आपने अपने खुदाओं से माँगी थी। यही बक्शी जानी थी। इसी को मौत भी बनना था। 


दिल्ली जाइए तो रिंग रोड जाइए। थोड़े पैसे लगाइए और टैक्सी से तफ़री करिए। महबूब बग़ल में हो। उसकी गोद में आपकी हथेलियाँ। अगर आपका ड्राइवर सरकार का प्रशंसक हो तो आप भी वही बन जाइए। अगर महबूब आपकी ना दिखाई देने वाली गर्दन चूमना चाहे, चूमने दें। दिल्ली की सर्दी में, उसकी बाहें अगर आपके कंधे सहलाना चाहें, सहलाने दें। ये नेमत फिर नहीं आपके हिस्से आने वाली। बहुत लम्बी ज़िंदगी में दिल्ली में मोहब्बत वाली सर्दियाँ, सिर्फ़ एक बार ही आती हैं। आप जानते हैं, आप इस यात्रा पर टीस का सौदा करने निकले हैं। चाँद फिर चुभेगा ज़िंदगी भर, हर यात्रा अकेली होगी। हर ग़ज़ल में कई कई बार आपको क़ाफ़िये चुभेंगे। लेकिन वही आपकी येशु बनेगी। उसने सलीब चुना है, आपकी सबसे सुंदर स्मृति बनने के लिए, आपकी सबसे अपनी कविता बनने के लिए। 


पुरानी दिल्ली में उसके साथ पैदल चलिए। उसने आपकी मुफ़लिसी अपने लिए चुनी है। आपको अपना घर माना है। उसकी कद्र करिए। इन क्षणों के बारे में सोचिए कि इनसे आपकी ज़िंदगी रौशन होनी है। जो दुखेगा वही, आने वाली सभी सर्दियों में गर्म रखेगा।जो रुलाएगा, सुकून भी उसी से आएगा। उसको जलेबियाँ खिलाइए शीशगंज गुरुद्वारे के पास और उससे कहिए कि आपके बाद वह मीठा खाना छोड़ दे। मीठा, अवसाद बढ़ाता है। ज़िंदगी कितनी बड़ी यात्रा है, यह आपने जाने कितनी हिंदी फ़िल्मों में देखा है। अग्रसेन की बावड़ी बिना देखे छोड़ दीजिए। जेएनयु मत जाइए। लाल क़िले में भीड़ होती है। साहित्य अकादमी की सुंदर दुकान देख आइए। उससे कहिए कि किसी अनजान रास्ते पर से वह आपको पिक करे और आपको नॉर्थ कैम्पस लेकर जाए। 


नॉर्थ कैम्पस में उसका हाथ पकड़ कर चलिए और लोगों को रश्क करने दीजिए। उसको कुल्चे खिलाइए। और कहिए कि आप सस्ते आदमी है। उसको आपसे मोहब्बत है। यह बात वह इग्नोर कर देगी। आर्ट फ़ैकल्टी में उसको पेड़ के नीचे बैठ कर अपने दिल्ली के दिनों के क़िस्से कहिए। वह हंसेगी। शुक्रिया कहेगी आपके ग़लत निर्णयों का और आपसे थोड़ा और ज़्यादा प्यार करेगी। आख़िर आप सेल्फ़ पिटी में इसी दिन के लिए तो डूबे हुए थे। फिर शाम आएगी और आपको उसे उसकी बहन के घर छोड़ कर वापसी की फ़्लाइट लेनी है। उसकी बहन के घर ज़िंदगी रहती है और आप ख़्वाब में हैं। 


एक स्टाप पहले उतरिए। अंधेरा हो चुका होगा। उसकी आँखें गीली होंगी। सन्नाटा बढ़ने लगा होगा। उसके फ़ोन में सैकड़ों मिस कॉलें जमा हो गयी होंगी। उसकी साँस की गंध अपनी साँसों में भर लीजिए। यह यात्रा का आख़िरी पड़ाव है। और एक नयी यात्रा का पहला। जिस दिल्ली ने यह ख़्वाब आपको दिया है, वही आपसे सब छीन लेने वाली है। उसको चुप कराइए। वह अपने भीतर बहुत कुछ दफ़्न करती है। यह बात समझिए। यही एक धोखा है जो अपनी पूरी उम्र में वह आपको देगी। जो आपसे छूटेगा, वह दिल्ली नहीं होगी। उससे कहिए, वह अपनी हथेलियों में आपके चेहरे को भरे। उससे कहिए कि वह अपनी काजल वाली आँखों से आपको थोड़ी देर देखे और फिर अपनी बाहों में भर ले आपको। 


आप नहीं चाहते कोई ख़्वाब ख़त्म हो। अनजान शहर में ख़ुद को गुमाने के बाद, आप खुद से भी मिलने से डरते हैं। वस्ल का एक दिन, हिज्र की शबों पर भारी पड़ेगा। यही दिलासा देना है ज़िंदगी भर। मीर साहब, तमाम पेंचों-ख़म कैसे झेले आपने। 


अंचित। 

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