सफ़रगोई : इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना : एक दिन वैशाली


एक
सफ़र पर निकला था साल के पहले महीने में. और साल के आख़िरी महीने के आख़िरी दिनों में एक सफ़र और. बीच में उम्र का एक बहुत बड़ा हिस्सा बीत गया. इतना बड़ा कि जितना बड़ा पहले कभी एक साल में मुझसे जिया नहीं गया था. मुझको अनुभवों का नशा है. और सफ़र इसीलिए खींचते रहे बार बार. यही वह साल होना था जब सफ़र को गले की ज़ंजीर बन जाना था, जब कमरे के एक कोने में, एक गंध की स्मृति लिए, मुझे अपने अकेलेपन में पड़े रहना था. लेकिन अपने भीतर हिम्मत आपको खोजनी पड़ती है. सब हार कर, फिर आदमी कैसे उठता है? एक राजकुमार को क्या पड़ी थी कि सब छोड़ कर वह घर से निकल गया. निराशा से उबरने के लिए निराशा लगती है, यह सोचने वाला मैं कोई पहला नहीं. 


मोहब्बत में टूट जाने के बाद, ख़ुद को जोड़ने के लिए दोस्त लगते तो हैं, लेकिन निशान नहीं जाते. घाव का दाग बना रहता है. देह की मिट्टी इतनी नम नहीं  होती कि भरभरा जाने के ख़तरे ख़त्म हो जाएँ. दिल्ली इतनी दूर है कि मैं वैशाली ही जा सकता था. बुद्ध के पास जाना कितना क्लिशे बन चुका है. मुझे प्रेयसी का चेहरा बुद्ध की तरह नहीं दिखा.  असंख्य कविताओं में जैसे प्रेमी प्रेम करते हुए बुद्ध हो जाते हैं, न मैंने कभी खुद को बुद्ध पाया. इससे बचना चाहिए. इससे भागना चाहिए. हो सके तो विस्मृति से कहना चाहिए कि वह सब अपने साथ ले जाए. शांति स्तूप उसी तरह झड़ रहा है जैसे मेरे जीवन से शांति. संग्रहालय की दीवारें अब सरकारों के काम की नहीं रहीं. जो अंदर है दुनिया मेरे, उसी का एक इक्स्टेन्शन भर हो गया है बाहरी सब कुछ. मार्क्स मुझसे नफ़रत करेंगे और कोलरिज मुझे चूम लेंगे. एक भग्नावशेष हो चुका आदमी, ज्ञान की तलाश में भग्नावशेषों में घूमता हुआ. लेकिन वहाँ जाना चाहिए था . वहाँ की असीम नीरवता को, सर्दियों की धूप को अपनी चाहों पर पड़ने देना चाहिए था. 


सफ़र तो हमेशा ही कविता से दर्शन की तरफ होता है. बहुत गहरे पानी में पैठने से मोती मिलता है. प्रेमचंद कहते हैं. निराशा में जितना डूबेंगे. उतना उबर जाएँगे. आख़िर, हम हों ना हों, स्मृति तो रहेगी. यह कॉन्सलेशन कब काम आएगा. और आस्था की खोज में अगर आप ईश्वर के यहाँ नहीं गए तो आप ईमानदार नहीं. सर झुकाना, अपनी हार को स्वीकार करना, समर्पण नहीं, ठहराव है, और यह समझना है कि कुछ हमेशा नहीं रहता. कि दुनिया का सबसे पहला गणतंत्र भी धूल हो जा सकता है. गढ़ मिट्टी के डीहों में बदल जा सकते हैं. राजे की सत्ता करुणा और प्रेम की दुनिया से ना बड़ी होती है स्थायी. तो जब सब मिट जाता है, सिर्फ़ करुणा के उदाहरण बचे रहते हैं. समय उसी का दुशाला ओढ़ कर ख़ुद को उष्ण रखता है. 


वैशाली ने मुझे याद दिलाया कि तुमने मुझसे बेइंतहा प्रेम किया. बिना शर्तों के किया. बिना वादों के किया. बिना यह सोचे किया कि बदले में तुमको क्या मिला. इतिहास कर्तव्य निभाते हुए किरदारों का कुल जमा भी है. समय की ख़राबियों से जूझने का क़िस्सा भी है. मुझको बुद्ध नहीं होना. ना तुमको होना है. हम क्लिशे होते जाते ख़राब बिंबों में एक दूसरे को मिले तो मैं ख़राब कवि ठहरा और तुम साधारण प्रेमिका. हमको जीवन की तरह होना है. और चूँकि जीवन का कोई एक घर नहीं होता सफ़र का हर कण घर की तरह है.  खो जाने और पा लेने से ऊपर है जीवन. अपने संगीत से बना हुआ. अपनी लय पर झूलता हुआ. अकाल में किसी के पाँव पड़ते, बारिश की तरह बरसता हुआ. 

1 टिप्पणी:

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