सफ़रगोई : राजगीर: तुम्हारे बग़ैर भी एक सफ़र पर निकला हूँ.


 


कॉलेज से एक ट्रिप जा रही थी राजगीर. पावापुरी भी रुकना था. नालंदा भी. ठंड थी. बहुत. मैं एक छोटे, बहुत छोटे कमरे में रहा करता था. कॉलेज के ही पास. झड़ती दीवारें थीं, सीलन वालीं. पैसे कम होते थे, कोई कोई दिन होता जब जेब में दस का नोट नहीं होता था. वो जाना चाहती थी. उसने तय कर दिया सब. मेरे हिस्से के पैसे भी दे दिए. मुझे बिना बताए. मैंने पटना जंकशन से पचास रुपए में गर्म मोज़े ख़रीदे. मेरे पास एक लाल शॉल थी और एक पुराना हाफ़ स्वेटर. मैंने सोचा था एक जैकेट लूँगा पर तब तक वे पैसे सिगरेट और किताबों में जा चुके थे. एक बोरिंग क्लास थी, टॉपरों को बैंकों में जाना था, लड़कियों को ब्याहता हो जाना था और बच गए लोगों को भीड़ बन कर गुम जाना था. फिर भी उसने हक़ जता, जाने के एक दिन पहले मेरी बढ़ी दाढ़ी से अपने गाल रगड़ते हुए मुझको अपना फ़रमान सुनाया. ज़िंदगी के सारे सफ़र शायद उसी दिन शुरू हुए. 


ज़िंदगी की तमाम रंगीनियों से एक सफ़र में ही वाक़िफ़ हुआ जा सकता है. एक सफ़र भर में जितने जंगल आपने अपने अंदर उगाए हैं, वे आपके गले का फंदा बन सकते हैं. हम ज़िंदगी कितने सारे क्लिशे जमा करते हुए गुज़ारते हैं, ये भी होना था. बहुत सुबह निकलना था. एक बस तय थी. विभाग के आगे, आकर लग गयी थी. कक्षा के सभी वर्गों के लोग जमा थे- पैसे वाले लड़के थे, लड़कियों को काट -काट कर सेब खिलाने वाले लड़के थे, शर्माने वाले, बस के पीछे की सीटों पर जम जाने वाले लड़के थे, अंत्याक्षरी खेलने वाली लड़कियाँ थीं, हैट लगाने वाली लड़कियाँ थीं, सजी धजी ऊँची हीलों में नालंदा घूमने वाली लड़कियाँ थीं. लेकिन मैं इनके लिए नहीं जा रहा था. उसने लेविस की लाल टीशर्ट पहनी थी, डेनिम की नीली जींस, एक मोटी जैकेट और एक सफ़ेद दुपट्टा जो बाद में मैंने चुरा लिया. कविता कवि को ऐसे ही मिलती है, औसतताओं के बीच, क्षणभंगुर, गोगोल के ओवरकोट की तरह. 


पहला पड़ाव था जलमंदिर. पर मुझे सफ़र याद रहते हैं, मंज़िलें नहीं. इससे भी बचना सीखना चाहिए था. जलमंदिर के पोखरे में कमल के फूल थे और कमल के फूलों से मुझे भारी दिक्कत. मेरे लिए रास्ते का मतलब उसे देखना था. हम सबसे आख़िर की सीटों से पहली वाली सीटों पर बैठे. उसने मुझे खिड़की वाली सीट नहीं दी. अब मैं सिगरेट नहीं पी सकता था, और उसके रहते वैसे भी तलब कम होती थी. महावीर, पावापुरी अपने सफ़र के आख़िर में आए थे और मैं ज़िंदगी के रंगों से दूर भागने का तय किए हुए, एक डोर से बंधा अकारण ही. उसने मछलियों को खाना खिलाया. और मैं उसे देखता रहा. वो मुझे देख कर मुस्कुराती रही और मैं उसे देखता रहा. वो खुद में गुम जाती थी, सबसे अलग, सबसे ज़्यादा धीर, ना के बराबर होंठ, चश्मे को बार बार शीशे पर हाथ रख कर वापस  धकेलती हुई, हँसती हुई. मैं कहाँ जा रहा था? मैं कौन से सफ़र पर था? उसकी सहेलियों के सामने मैं झेंप जाता. वे मुस्कुराती हुई आतीं और उसे खींच कहीं और ले जातीं. 


नालंदा में उसने मुझे खोज लिया और ऐसे कि मुझे लगा कि वह फिर मुझे नहीं छोड़ेगी. कभी नहीं. यही खेल क़िस्मत सबसे पहले आपसे खेलती है. ज़ाहिर है, लम्बे पुराने स्तूप, जहाँ कभी तथागत आए होंगे, वही जो बनारस गए, वही जो कुशीनगर गए, वही जो इन जंगलों में भटकते रहे, वही तथागत जिन्होंने यशोधरा को तज दिया, उनसे मुझे भाग्य और भटक के कुछ पाठ नालंदा में सीख लेने चाहिए थे. मोह दुःख है, नालंदा की लाल ईंटों ने मुझसे कहा, मैंने सुना नहीं. उसने बहाने से मेरा हाथ पकड़ा और फिर छोड़ा ही नहीं. उन सर्दियों में एक देह-गंध घर की तरह बन गयी. ज़िंदगी में पहली बार. लौटने तक मुझे अपनी हदों के बारे में नहीं सोचना था. एक गाइड था जो कुछ कहता था, एक लड़की थी जो विदेशियों की तरह काले चश्मे और हैट में घूम रही थी, शिक्षक थे जो खुद में गुम थे, वो लम्बी हील वाली लड़की एक दो बार उन खंडहरों में गिर भी गयी थी, उसको लोगों ने उठाया भी था और एक लड़के ने सेब भी खिलाए थे. दुनिया में सब होता रहता है, लेकिन क्या फ़र्क़ पड़ता था. 

गरीब के हाथ ख़ज़ाना लग गया था. 


राजगीर में पहाड़ थे, लम्बी सीढ़ियाँ थीं और उतरती हुई धूप. स्तूप के पास, रोपवे से उतर कर, मैं उसके कंधे से लद गया. उसने मेरा सस्ता सौ रुपए वाला काला चश्मा लगा लिया और जूठी कोल्ड ड्रिंक ऑफ़र की. एक लड़का एक लड़की की कमर में हाथ डाले तस्वीर खींचा रहा था. हमने तय किया हम तस्वीरें नहीं लेंगे. कुछ तयशुदा नहीं चाहिए था. उसने कहा वो यादों से डरती है और एक उम्र भर की बेचैनी मेरे हिस्से धर दी. उसने मुझे क्या लिखना है, उसी शाम तय कर दिया था, भले ही यह सब सालों बाद मेरी समझ में आता. मैंने प्रेम में बुद्ध होने के बारे में सुन रखा था, मुझे नहीं होना था, मुझे प्रेम में एक गंजा तोंद वाला मोटा अधेड़ होना था. देखिए, कैसे एक दिन में आदमी की चाहें कितनी बदल जाती हैं. कोई दर्शन राजगीर जाकर भी मुझे नहीं समझ आया. उसने एक कोने में खींचा मुझे, सिगरेट जलाई और देर तक पहाड़ से खाई पर गिरते हुए कुहासे और गुमती हुई धूप में हम एक दूसरे में छिपने की कोशिश करते रहे. कितने कम शब्दों की ज़रूरत थी और कितना थोड़ा था जो था. उससे ज़्यादा चाहिए भी नहीं था. 


लौटते हुए, हम बेगम अख़्तर की आवाज़ एक हेडफ़ोन से सुनते रहे. इत्मिनान था कि एक सफ़र भर ही सही, हम साथी थे. उसने अपने तलवे बस के अंधेरे में मेरे तलवों पर रख दिए थे. सफ़र में भी घर मिल जाता है. और फिर कौन लौटना चाहता है. लेकिन चाहने से क्या होता है. एक बड़ा टुकड़ा दिल का टूटा और उसके पास रह गया. ना ज़िंदगी में कुछ रुकता है, ना सफ़र थमते हैं. हर सफ़र का हासिल यही है. प्रुस्त एक जगह कहते हैं कि हमें वे चीज़ें भी याद रहती हैं जो घटी ही नहीं. लेकिन इसका क्या मतलब बनता है. कुछ नहीं. तो क्या मैं किसी सफ़र पर हूँ? अगर हूँ तो क्या अकेला हूँ? 

1 टिप्पणी:

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